Monday, 28 February 2011

मकड़ियों का जाला ...










दूर तक अन्धेरा फिर उजाला है,
मेरे घर में मकड़ियों का जाला है !!

कैसे सुलझाऊं इस मकड़ जाल को,
घर में मैंने मकड़ियों को पाला है !!

सोचता हूँ मैं अब घर को रुख करूं,
रहता है उसमे भी हम-निवाला है !!

घर के बाहर खड़ा जो पेड़ नीम का,
जालों की गाँठ में वो भी काला है !!

जख्म जो मिला मकड़ से मिला,
प्यार से नासूर भी भरने वाला है !!

दुश्मनों के जाल कैसे मैं तोड़ दूँ,
मेरे घर अभिमन्युं होने वाला है !!

तन की सांस बची अब ये कह रही,
दुःख का बादल आज छंटने वाला है !!

घर है मेरा, घर है ये प्यार की गाह,
सुना है "अजीब" देवता बसने वाला है !!



GOVIND "AZIB" ★








2 comments:

  1. एक उम्दा और रचना गोविन्द

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  2. आप बहुत ही नायाब लिख रहे हैं

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