Monday, 28 February 2011

Friday, 25 February 2011

होश खोते रहे उनके होठों में भी प्यास हो........



 
मुद्दत से मुन्तजिर रहे जिसके,
जब उनसे मुलाक़ात हो,

पूनम की रात हो
चांदनी की बरसात हो

खामोश हो तहाइयां
और एक जरुरी बात हो

बाहों का आशियाना हो
सुन्दर ख्यालात हो
खुलूसो-प्यार का मरहम हो
कुर्बत की महकात हो

होश खोते रहे उनके
होठों में भी प्यास हो

खुश्बू घुलें फ़ज़ाओं में
दिलकश से हालात हो

ना रहे ताबीर मुश्किल
दुआओं की सौगात हो

मिट जाएँ दूरियाँ दिल की
प्यार की दो बात हो

काश .....

प्यासा ना रहे समुन्दर भी
ज़न्नत से लम्हात हो

"अजीब' भी मुतमईन रहे
जो लबो की बरसात हो


 

 

“मुझे अकसर एक गुमान रहता है...........






“मुझे अकसर एक गुमान रहता है
तू मेरे दिल के दरमियान रहता है

तुझ पे कैसे कोई कर ले यकीन
खता इतनी है तू बेजुबान रहता है

फूल बन शाखों पे तू झूल जाए
सारे चमन को ये गुमान रहता है

कैसे सजदा करे कोई तेरा दिलबर
शामे-फुरकत से जो अन्जान रहता है

बंद कमरों में अक्सर लोग सुनते है
गजलों में मेरे तू दिलों-जान रहता है

मिल जाए उसे कुर्बते-जानाँ यहाँ
"अजीब" अकसर परेशान रहता है "



जब भी खोया तेरे ख्यालों में खोया.......









जब भी खोया तेरे ख्यालों में खोया
जिन्दगी के हंसी सवालों में खोया

आँखों से आंसू गिरे न मिला सुकूं
मयकदे के छलके प्यालों में खोया

पहलू में जाकर उनके जो ढल गये
बाहों के गर्म घेरे सवालों में खोया

दर्दे गम को जब भी नुमायाँ किया
हिज्र की रात को उजालो में खोया

गरीब की बेटी अधेड़ को सौप कर
बाप भी गुर्बत के निवालों में खोया

पाठ नफ़रत कुछ ऐसा पढ़ा गया
इंसा मस्जिद और शिवालों में खोया

छल फरेब का इल्म कैसे हो उन्हें
जिन्दगी जो मकड़जालों में खोया

उम्र गुजारी जिसने खुराफातों में
दोस्त वो "अजीब" मलालों में खोया

तुम मंदिर जाते दुआ के लिए "अजीब"

तुझसे मोहब्बत बेपनाह करता हूँ
ख़्वाबोंमें आने का गुनाह करता हूँ

सुन के आहट तेरे क़दमों की जानां
दर पे तेरे जाने का गुनाह करता हूँ

दिल का आलम भी अजीब होता है
हिज्र में मुस्कराने का गुनाह करता हूँ

है ये किस्मत मेरी या उनका सितम
गमजदा हो जाने का गुनाह करता हूँ

ऐसी क्या अदावत जो दिल में सजोये
मैं रफाकत बढाने का गुनाह करता हूँ

तुम मंदिर जाते दुआ के लिए "अजीब"
मैं मयखाने जाने का गुनाह करता हूँ

अब सोचता हूँ मैं...

वो कितना मेरे पास था अब सोचता हूँ मैं
 
दिल में आमो-ख़ास था अब सोचता हूँ मैं

वो मेरा नसीब था खुशियाँ तमाम लिए
 
न तब होशोहवास था अब सोचता हूँ मैं

वो भी एक इन्सान था करता गया खता
 
गम ही उसके पास था अब सोचता हूँ मैं

बे-मौसम बरस गया सावन की प्यास में
 
वो जीने की आस था अब सोचता हूँ मैं

वो रहा अहले सितम जब तक वो जिया
 
ज़िंदा सी एक लाश था अब सोचता हूँ मैं
 
झूठी तसल्लियों में जिए कैसे "अजीब"
 
प्यारा सा एहसास था अब सोचता हूँ मैं