अपनी जिन्दगी की किताब ऎसी है
रफ़्तार-ए-क़लम महताब जैसी है
दौर-ए-फुरकत लिखते हैं बार बार
साथ दिल का मिले आफताब जैसी है
जिन्दगी की नाँव भी चलती डगर डगर
साहिल मिले हुस्न-ए-ख्वाब जैसी है
कब्र में पैर लटका के कहता बुढा शज़र
शक्ल उसकी भी देखो गुलाब जैसी है
पढ़ चुके हैं जो दिल की सारी ख्वाहिशें
हर तमन्ना में ख़लिश अज़ाब जैसी है
"अजीब" समझना हो समझ ले तू
मुफलिसी की जवानी शराब जैसी है

बहुत ही बढ़िया एक बेहतरीन ग़ज़ल गोविन्द आपका ब्लॉग मुझे बहुत पसंद आया
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